दो हिस्सों में

Sunday, January 18, 2026

इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में

बेचैनी इतनी 
कि तुम मुझे क्यूँ समझ नहीं पाए

और सुकून इतना
कि तुमसे ज़्यादा मुझे जानेगा कौन !!


इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में

नाराज़गी इतनी
कि मुड़कर देखना ज़रूरी नहीं था 

और उम्मीद इतनी
कि कभी तो दिल कि हर बात पता होगी !!


इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में

बेसब्री इतनी
कि तुम्हें सोचे बिना पल नहीं कटता

और सब्र इतना
कि तेरे इंतज़ार में उम्रें बीत जाएँ !!

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