इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में
बेचैनी इतनी
कि तुम मुझे समझ न पाए
और सुकून इतना
कि तुम मुझे पहले से जानते हो
इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में
नाराज़गी इतनी
कि तुमने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा
और उम्मीद इतनी
कि कभी तो मुझे दिल कि सुनाओगे
इस क़दर बँट गई हूँ दो हिस्सों में
बेसब्री इतनी
कि तुम्हें सोचे बिना पल नहीं कटता
और सब्र इतना
कि तेरे इंतज़ार में उम्रें बीत जाएँ


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